बहुत कुछ छोड़ कर छोड़ा है तुझ को
कि अब तो प्यार भी रोड़ा है तुझ को
है बारिश तू मैं छतरी हो गया हूँ
मिरा तो नाम भी रोड़ा है तुझ को
भला फिर किस लिए जीता रहूँ मैं
मिरा जब प्यार ही थोड़ा है तुझ को
तिरे पाँओं ज़मीं पर कब टिके हैं
मुयस्सर जब से ये घोड़ा है तुझ को
मैं तन्हा रह गया सब जानते हैं
मगर मैं ने कहाँ छोड़ा है तुझ को
— Gopesh "Tanha"















