ख़्वाब आँखों में अपनी सजाना नहीं
दिल किसी से भी अब ये लगाना नहीं
देखिए न मुझे आप मुड़-मुड़ के यूँ,
ऐसे दिल में मिलेगा ठिकाना नहीं
बारहा कीजिए आँखों से गुफ़्तगू
ज़िक्र मेरा लबों पे तू लाना नहीं
मैं तो बादल हूँ, बरसूँगा मैं झूम के
मेरी तरह तुम आँसू बहाना नहीं
ये जहाँ है फ़रेबी भी 'गुस्ताख' भी
इस जहाँ से मोहब्बत निभाना नहीं
— Rohit Gustakh















