करता भी और क्या ज़िन्दगी में
लगता है बस ये मन शा'इरी में
इस से अच्छा तो तुम इश्क़ करते
क्या मिला तुम को यूँ ख़ुद-कुशी में
एक औरत ही बस जानती है
राज़ ख़ुश होने का बेबसी में
कोई राधा या मीरा से पूछे
कटते हैं कैसे दिन आशिक़ी में
एक माँ- बाप जिस के अलावा
छोड़ जाते हैं सब मुफ़्लिसी में
तुम मोहब्बत का मतलब यूँ समझो
राम का रोना उस बेकली में
इश्क़ उन लड़कियों से भी क्या जो
पास आती नहीं तिश्नगी में
मैं उसे दोस्त कहता नहीं अब
शर्त जिस ने रखी दोस्ती में
— Kumar gyaneshwar















