तुम्हारे बिन अकेले ग़म में ऐसे जी नहीं सकता
मैं चाहूँ भी तो इन ज़ख़्मों को तन्हा सी नहीं सकता
ये उसके उन्स में जलते दीयों की रौशनी, इसको
बढ़ा गर वो नहीं सकता बुझा मैं भी नहीं सकता
तुम्हारे बिन जहाँ में बस तुम्हारी याद को लेकर
गुज़र तो जायेगा जीवन मगर यूँँ जी नहीं सकता
किसी दिन आ मिलो मुझको मेरी यादों से बाहर भी
मुझे कहना है क्या कुछ जो बता यूँँही नहीं सकता
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Hasan Raqim
our suggestion based on Hasan Raqim
As you were reading I Miss you Shayari Shayari