“पुरुष की कल्पनाएँ"
दफ़्तर से लौट कर
थका हुआ
पलँग पर बेहोश सा लेटा हुआ
एक पुरुष
अपने मन में कैसी कल्पना करता है
वो कल्पना करता है
उस दिन की
जब वो सभी सामाजिक बंधनों से मुक्त
किसी नदी या झील के किनारे बैठा होगा
जब वो सुन सकेगा
सुब्ह के पंछियों की आवाज़ें
जब वो देख सकेगा
ढलता हुआ सूर्य
जब वो भी गिन सकेगा
आसमान के तारे
जब वो महसूस कर सकेगा
अपने आस-पास के वातावरण में मौजूद शांति
सभी प्रकार की चिंताओं से परे
जब वो सुन सकेगा
हृदय की बातें
जब वो बातें कर सकेगा
ख़ुद से
जब नहीं खलेगी उसे ये बेपरवाही
और भाने लगेगा अकेलापन
इस अकेलेपन में वो सुन रहा होगा
कोई मधुर संगीत
जिस की धुन में
उस के पैर थिरकने के लिए
उत्साहित हो रहे होंगे
किंतु इसी बीच
अरनिमा अपने कोमल हाथों से
उस के पलकों को स्पर्श करती है
और उसे खींच लाती है
काल्पनिक लोक से बाहर
वो उठता है
और अपनी काल्पनिकता को
अपने थैले में भरकर
फिर से दफ़्तर के रास्ते
चल पड़ता है
उस की आत्मा से
महज़ एक आवाज़ आती है
आदमी की कल्पनाएँ
क्षणभंगुर होती हैं।















