कम-निगाही में मुब्तला था मैं
तुम को अपना समझ रहा था मैं
दिल का भरना भी फ़ितरती शय है
ग़ैर-फ़ितरी था बावला था मैं
नींद में डर के उठ न जाओ कहीं
रात की रात जागता था मैं
मैं वफ़ाओं की बात करता था
इस लिए एक मसअला था मैं।क्ष
रिश्ते वालों ने कर दिया इनकार
सबके बर्तन उठा रहा था मैं
जब मेरा अच्छा वक़्त घर आया
तब तो परदेस जा चुका था मैं
काटती थी वो मेरी बातों को
उस की हर बात मानता था मैं
फिर मेरी लाश मिल गई घर से
आप के राज़ जानता था मैं
— Jaffer Imam















