Jaffer Imam

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Jaffer Imam shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jaffer Imam's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जो मिला उस सेे एहतिजाज किया मैं ने ज़ख़्मों का यूँँ इलाज किया — Jaffer Imam

Ghazal

तीरगी का न उजालों का अज़ाख़ाना है दिल मिरा बीते ज़मानों का अज़ाख़ाना है किस ने सोचा था हमें साॅंस की क़िल्लत होगी मुल्क अब दर्द के मारों का अज़ाख़ाना है टूट के आते हैं इस सिम्त ही गिरने वाले ये ज़मीं या'नी सितारों का अज़ाख़ाना है सठ के घर में हैं गिरवी के बहुत से ज़ेवर ये तिजोरी तो ख़ज़ानों का अज़ाख़ाना है बैठके रोते हैं वो अपनी बुझी क़िस्मत पर चाँदनी रात चराग़ों का अज़ाख़ाना है उनपे रोता हूँ मैं जिनपे नहीं रोता कोई चश्म-ए-नाचीज़ हज़ारों का अज़ाख़ाना है ग़म पलटने के लिए जॉन को पढ़ लेते हैं शा'इरी उन की जवानों का अज़ाख़ाना है जिन के रोने से लरज़ जाते हैं दोनों आलम कर्बला ऐसे घरानों का अज़ाख़ाना है — Jaffer Imam
बिना पर का परिंदा कर रहे हैं मुझे ये ख़्वाब अंधे कर रहे हैं बिठाकर हर दफ़ा पिछली सफ़ों में मुझे ये लोग ज़ाया' कर रहे हैं फ़क़त कुछ झूठे वादे ख़र्च कर के बहुत से दिल का धंधा कर रहे हैं सभी ने एक अफ़साना पढ़ा है तेरी जो जो तमन्ना कर रहे हैं लगाऍंगे दवा जल्दी भी क्या है अभी तो ज़ख़्म गहरा कर रहे हैं ख़ुदा उन के भी कपड़े साफ़ रक्खे मेरा दामन जो मैला कर रहे हैं अभी एक नूर उतरेगा यहाँ पर अभी सरवर अँधेरा कर रहे हैं मोहब्बत करने की हिम्मत नहीं है मगर हम इस्तिख़ारा कर रहे हैं किए थे हम ने तुम सेे जितने वादे वो सब तोड़ेंगे वा'दा कर रहे हैं हिफ़ाज़त के लिए रहते हैं पीछे उसे लगता है पीछा कर रहे हैं नहीं है कारख़ाने में कोई ग़म मगर हम शे'र पैदा कर रहे हैं वहाँ ऊँचाई पे सब बँट चुका है ज़मीं पे लोग झगड़ा कर रहे हैं छुपा रक्खा है दिल में नाम उस का मोहब्बत में तक़य्या कर रहे हैं — Jaffer Imam
इक दूजे से दूर खड़े हैं हम दोनों फिर भी उन को खटक रहे हैं हम दोनों अब अपने-अपने घर को मुड़ जाना है साथ में दुनिया देख चुके हैं हम दोनों उस को फूल और मुझ को पानी बनना है बाग़ की जानिब देख रहे हैं हम दोनों गाड़ी चलने वाली है अब हिजरत की अपना दामन झाड़ रहे हैं हम दोनों उन सबने भी हम जैसी ग़लती की थी जिन लोगों के बा'द मरे हैं हम दोनों साहिल पर आ कर कश्ती कैसे छोड़ें तूफ़ानों में साथ लड़े हैं हम दोनों वादे क़स में जब भी याद किए हम ने पेट पकड़ कर ख़ूब हॅंसे हैं हम दोनों मेरी तन्हाई भी ऐसी गप्पी है आख़िरी बस भी छोड़ चुके हैं हम दोनों — Jaffer Imam
इस तरह हम कभी लाठी के सहारे चलते तुम जो होते तो समुंदर के किनारे चलते जो तुम्हें दर्द है उन सब की वजह बस मैं हूँ जो है तकलीफ़ मुझे वो है तुम्हारे चलते अम्मा-अब्बा का भी मन था कहीं बाहर जाते इक दफ़ा पूछ तो लेते वो बिचारे चलते क्या मज़ा आता अगर लफ़्ज़ न होता ईजाद जहाॅं जाते वहाॅं आँखों के इशारे चलते इक क़बीले की तरह साथ में रहते हम सब बैठते साथ में और साथ में सारे चलते हम ही कुछ पाँच या छह सौ हैं मोहब्बत वाले जंग सरहद पे रुकी है तो हमारे चलते फोन न होता तो चिट्ठी लिए उड़ते पंछी गाॅंव-गाॅंव में परिंदों के इदारे चलते — Jaffer Imam
करोड़ों लोग जितना सोचते हैं तुझे हम उतना तन्हा सोचते हैं ग़रीबों का अलग मस्लक है साहब ये हर भूखे को अपना सोचते हैं तुम उन सेे पूछना मौक़ा मिले तो हमारे बारे में क्या सोचते हैं उसे ना बोलना आता नहीं था वो कह देती थी अच्छा सोचते हैं हर इक झगड़े की जड़ ये मसअला है कि हम सब ख़ुद को अच्छा सोचते हैं तो फिर ये रिश्वतें लेनी पड़ेंगी अगर हम अपने घर का सोचते हैं तुम उन की बात में मत आओ लड़की वो सब को अपने जैसा सोचते हैं असल में मौत है आग़ाज़ अपना मगर हम लोग उल्टा सोचते हैं निकल आए हैं हम रोज़-ए-जज़ा से चलो अब अपना-अपना सोचते हैं — Jaffer Imam