दिल मिरा आज ख़ूब भारी है
जौन की कैफ़ियत सी तारी है
जिस का तय है कभी नहीं आना
आजकल उस की इंतिज़ारी है
मेरी यारी किसी से है ही नहीं
पूछ लो जिन से मेरी यारी है
मेरी गर्दन तो काट दी उस ने
फिर भी पगड़ी नहीं उतारी है
आजकल ख़ूब लिख रहा हूँ मैं
आजकल थोड़ी ग़म गुज़ारी है
जो मिटाया गया सफ़ों से मेरे
मुझ पे उस शे'र की सवारी है
क्या कहूँ माँ ने मेरी कितनी दफ़ा
रोते-रोते नज़र उतारी है
माॅंगना ऐब है मियाँ जाफ़र
तू भी तहसीन का भिखारी है
— Jaffer Imam















