तिरे ग़म पे वो ग़म तारी नहीं है
हमारी इस लिए यारी नहीं है
तेरी आँखें भी हैं महरूम-ए-सहरा
तेरा घाव भी मेयारी नहीं है
रगों के रास्ते आया है हम तक
ग़म-ए-शब्बीर मक्कारी नहीं है
है मेरे हाथ में ज़ंजीर लेकिन
ये जीवन रेल की गाड़ी नहीं है
बताया है तुम्हें अपना समझकर
मेरी तकलीफ़ बाज़ारी नहीं है
— Jaffer Imam















