इक दूजे से दूर खड़े हैं हम दोनों
फिर भी उन को खटक रहे हैं हम दोनों
अब अपने-अपने घर को मुड़ जाना है
साथ में दुनिया देख चुके हैं हम दोनों
उस को फूल और मुझ को पानी बनना है
बाग़ की जानिब देख रहे हैं हम दोनों
गाड़ी चलने वाली है अब हिजरत की
अपना दामन झाड़ रहे हैं हम दोनों
उन सबने भी हम जैसी ग़लती की थी
जिन लोगों के बा'द मरे हैं हम दोनों
साहिल पर आ कर कश्ती कैसे छोड़ें
तूफ़ानों में साथ लड़े हैं हम दोनों
वादे क़स
में जब भी याद किए हम ने
पेट पकड़ कर ख़ूब हॅंसे हैं हम दोनों
मेरी तन्हाई भी ऐसी गप्पी है
आख़िरी बस भी छोड़ चुके हैं हम दोनों
— Jaffer Imam















