हर एक बात पे बस आस्तीं चढ़ानी है
यही तो हज़रत-ए-इंसान की कहानी है
ये इन्क़लाब के नारे तो ठीक हैं लेकिन
वो क्या करे कि जिसे नौकरी बचानी है
कहीं-कहीं पे मोहब्बत का मीम काफ़ी है
कहीं-कहीं पे तो तशदीद भी लगानी है
वफ़ा निभाते हो या'नी ये इस से ज़ाहिर है
तुम्हारे हाथ में अंगुश्तरी पुरानी है
ख़ुदा के नाम पे ये लूटने को आए हैं
जगह बताओ मुझे ज़िंदगी छुपानी है
ये कर्बला ही हमारी नजात है जाफ़र
बला-ओ-कर्ब से वाबस्तगी पुरानी है
— Jaffer Imam















