जिस का घर ग़ैर के मकान में है
वो परिंदा अभी उड़ान में है
कुछ भी तैयारियाँ नहीं मेरी
ज़िंदगी दौर-ए-इम्तिहान में है
हिज्र जन्नत से थोड़ी आई है
ये जुदाई इसी जहान में है
ऊँची महलों के जितने मालिक थे
वो सभी आज मुर्दगान में है
ये असर है तुम्हारी फ़ुर्क़त का
सबके ग़म अब मिरी अमान में है
इब्न-ए-आदम सँभाल के रखियो
तेरी इज़्ज़त तेरी ज़बान में है
कहाँ जाने की होड़ है पगले
अपनी धरती भी आसमान में है
कितना ख़ामोश है ये पत्थर भी
ये भी शायद किसी के ध्यान में है
— Jaffer Imam















