अजीब ज़ख़्म की नगरी पे फ़िल्म लिख रहा हूँ
क़हत में होंठ की पपड़ी पे फ़िल्म लिख रहा हूँ
सभी ने अपनी कहानी में मुझ को ठुकराया
तो अब मैं अपनी कहानी पे फ़िल्म लिख रहा हूँ
नहीं है मेरी कहानी में कोई शहज़ादा
मैं इक ग़रीब की बस्ती पे फ़िल्म लिख रहा हूँ
गए दिनों की मुझे इतने याद आने लगी
वरक़ को छोड़के तख़्ती पे फ़िल्म लिख रहा हूँ
जहाँ से बैठके वो रोज़ चाँद तकती है
समझ लो मैं उसी खिड़की पे फ़िल्म लिख रहा हूँ
गिरा दिया था मकाँ जिस का खाना जंगी ने
मैं उस शहीद की मिट्टी पे फ़िल्म लिख रहा हूँ
— Jaffer Imam















