जान बचाकर भागे थे धन छूट गया
घर में इक पीतल का बर्तन छूट गया
लोरी में भी शहज़ादे का ज़िक्र नहीं
इक लड़की का सारा बचपन छूट गया
गिरवी घर जैसे-तैसे छुड़वा लाया
पैसे कम थे माँ का कंगन छूट गया
अपनी ही तस्वीर में गुम रहता था मैं
वो आई तो हाथ से दर्पन छूट गया
नफ़रत वाली डोर को था
में रखा था
और मोहब्बत वाला बंधन छूट गया
उस की याद कभी आए तो लगता है
पैसों के चक्कर में पैशन छूट गया
— Jaffer Imam















