तीरगी का न उजालों का अज़ाख़ाना है
दिल मिरा बीते ज़मानों का अज़ाख़ाना है
किस ने सोचा था हमें साॅंस की क़िल्लत होगी
मुल्क अब दर्द के मारों का अज़ाख़ाना है
टूट के आते हैं इस सिम्त ही गिरने वाले
ये ज़मीं या'नी सितारों का अज़ाख़ाना है
सठ के घर में हैं गिरवी के बहुत से ज़ेवर
ये तिजोरी तो ख़ज़ानों का अज़ाख़ाना है
बैठके रोते हैं वो अपनी बुझी क़िस्मत पर
चाँदनी रात चराग़ों का अज़ाख़ाना है
उनपे रोता हूँ मैं जिनपे नहीं रोता कोई
चश्म-ए-नाचीज़ हज़ारों का अज़ाख़ाना है
ग़म पलटने के लिए जॉन को पढ़ लेते हैं
शा'इरी उन की जवानों का अज़ाख़ाना है
जिन के रोने से लरज़ जाते हैं दोनों आलम
कर्बला ऐसे घरानों का अज़ाख़ाना है















