इस तरह हम कभी लाठी के सहारे चलते

तुम जो होते तो समुंदर के किनारे चलते

जो तुम्हें दर्द है उन सब की वजह बस मैं हूँ
जो है तकलीफ़ मुझे वो है तुम्हारे चलते

अम्मा-अब्बा का भी मन था कहीं बाहर जाते
इक दफ़ा पूछ तो लेते वो बिचारे चलते

क्या मज़ा आता अगर लफ़्ज़ न होता ईजाद
जहाॅं जाते वहाॅं आँखों के इशारे चलते

इक क़बीले की तरह साथ में रहते हम सब
बैठते साथ में और साथ में सारे चलते

हम ही कुछ पाँच या छह सौ हैं मोहब्बत वाले
जंग सरहद पे रुकी है तो हमारे चलते

फोन न होता तो चिट्ठी लिए उड़ते पंछी
गाॅंव-गाॅंव में परिंदों के इदारे चलते

— Jaffer Imam

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