एक नेता ने वफ़ादारी दिखाई
पर तवायफ़ कोठा कैसे छोड़ पाई
दोस्त मेरा हिज्र पूरा हो गया है
शा'इरी अब और नहीं करनी है भाई
दिल में चुभती है वो बातें मेरे अक्सर
जो ज़बाँ तक आई पर फिर से दबाई
एक दिन में मैं ने दो दुख झेले हैं दोस्त
शादी की ही सुब्ह थी उस की सगाई
— Jagveer Singh















