Jagveer Singh

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Jagveer Singh shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jagveer Singh's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मज़हब पर आ जाए बात तो बस्ती जलती है रेप अगर हो तो सिर्फ़ मोमबत्ती जलती है — Jagveer Singh
रस्सी चाक़ू कहते मुझ को अक्सर बेहतर होगा ग़लत क़दम उट्ठा ले — Jagveer Singh
बस एक क़ैफियत ही मुसलसल सी तारी है लम्हात-ए-शाद में भी उदासी तू जारी है — Jagveer Singh
गांधी के जीवन से नहीं तो मौत से तो सीखिए पाँवों को छूने वाला गोली भी चला सकता है दोस्त — Jagveer Singh
तेरी इक झलक से मेरा दिन बने है अहिल्या को बस राम का लम्स काफ़ी — Jagveer Singh
ख़ुदा तुझ को ज़रा मालूम भी है क्या यहाँ क्या-क्या हुआ है तेरे कुन के बा'द — Jagveer Singh

Ghazal

दिल भी धुआँ-धुआँ चश्म-ए-पुरनम भी जी मुब्तला-ए-मसरूर और ग़म भी शादी में भी रश्क-ए-क़मर है वो और आज तो झुमके भी और ज़ुल्फ़-ए-ख़म भी बस एक तिश्नगी की देरी सब को फिर क्या गंगा क्या आब-ए-ज़मज़म भी ख़ुशियाँ मुझ पर शफ़ीक़ होती है यूँँ रफ़्ता-रफ़्ता अक्सर अक्सर कम भी ये क्या बात हुई ओ यार-ओ-अहबाब दम से हम और दम से घटता दम भी तेरी आँखों के कितने हैं क़ाइल शे'र हमारे नींद हमारी हम भी किया गुनाह-ओ-सवाब का ब्यौरा जब शाद-ख़ुशी के साथ हुआ मातम भी ग़ुबार-ए-याद-ए-माज़ी यूँँ उठता है पल में शो'ला पल भर में शबनम भी इक औरत से मुझ को दुख ही दुख है और फिर ये दुख भी वो ही मरहम भी — Jagveer Singh
नहीं इल्म मुझ को यहाँ पे ख़ुद का कि होता है मिरे साथ क्या न खिला है दिल में कोई भी गुल हुई जब से एक कली ख़फ़ा हूँ मैं जिस के आरज़ू-ओ-तलब में दिवाना अब मुझे ग़म ये है है गँवाया उस को जो सामने से तलब-ज़दा था कभी मिरा अना वज्ह बन गई फ़ासले की कि कौन आए मनाए अब उसे भी नहीं पता मैं भी भूल गया कि क्या था वो मसअला तू उदासी ओढ़े तो शाम हो मिरी बंद आँख करे तो रात तिरे रंग-रूप से सुब्ह तू मिरी नाज़नीं मिरी दिलरुबा वो यज़ीद तो गला काट के भी हुसैन से गया हार जंग जहाँ भर में जाना गया तो सिर्फ़ हुसैन नाम से कर्बला — Jagveer Singh
सभी ने देखा बस बस्ती में है सारा का सारा दुख महल ने तो दबा डाला महल में ही महल का दुख किसी ओशो को सुन मैं ने पराया कर दिया था दुख मगर अब दुख ये है जैसा भी था पर था तो मेरा दुख हज़ारों रेप रोके एक कोठे वाली औरत ने कभी सोचा है कितना भारी होगा वेश्या का दुख मेरा हर दिन वही दुख याद कर के कट रहा है जाँ कि जो तेरे नज़रिए से ले दे इक रात का था दुख ग़ज़ल भी मर्सिया हो जानी मेरे हाथ से इक दिन सभी रोएँगे गर मैं ने सुना डाला जो अपना दुख तेरे बच्चे अगर पूछे कभी तुझ सेे कि दुख मतलब उन्हें समझाना मेरा और मेरी शा'इरी का दुख किसी का दुख किसी से भी नहीं है कम मगर फिर भी सभी को लगता हाए-हाए सब से भारी मेरा दुख किसे मालूम आगे को मुयस्सर ही न हो दुख ही सो मुस्तक़बिल के ख़ातिर मैं ने कितना ही बचाया दुख सियासत इस लिए उलझा रखे हैं मसअले दूजे कि जनता को सदा भारी लगे दैर-ओ-हरम का दुख तेरे दुख से ग़ज़ल होती मेरी हासिल सो ख़ुश हूँ जान तेरे दुख से नहीं होता मुझे गर दुख तो होता दुख बिना मौसम बरसने वाले बादल तू कभी तो देख किसानों की बरसती आँखों में बिगड़ी उपज का दुख मुझे वैसे तो है ग्यारह महीनों का भी पर फिर भी मुझे खाता है अंदर से दिसम्बर से जो मिलता दुख तुम्हें तो सुननी है केवल ग़ज़ल फिर घर को जाना है कोई शाइ'र जी हाँ शाइ'र ही समझेगा ग़ज़ल का दुख सुख़न का पेशा इकलौता है ऐसा पेशा दुनिया में कि हो जिस में हमें महसूस अपना सा पराया दुख — Jagveer Singh
वफ़ा के बदले तू ने बे-वफ़ाई की तिरे हक़ में तो भी मैं ने दुहाई दी ज़मीं पे आ गिरा पंखा मिरे हाथों तिरे शाइ'र ने इक ऐसी लड़ाई की दबे थे फूल जितने भी किताबों में सभी को रद्दी वाले ने रिहाई दी रहे ग़ज़लें मिरी ग़मगीन यूँँ ही सो मिरे दुश्मन से तक उस ने सगाई की नहीं माना था इतना भी ग़लत तुझ को मगर फिर तू ने ही इतनी सफ़ाई दी तलफ़्फ़ुज़ को बुरा कहती तो कोई ना मगर उस ने ख़यालों की बुराई की बड़े मन से मिरी ग़ज़लें तू सुनती है तुझे मेरी कभी चीखें सुनाई दी उसी की मर्ज़ी से होगा अँधेरा भी उसी ने सामने से रौशनाई की मुसीबत में सँभाला उस ने मुझ को यूँँ भरी सर्दी में मानो इक रज़ाई दी हमारी शा'इरी में इस लिए दुख है मुहब्बत ने हमारी जग-हँसाई की — Jagveer Singh

Nazm

"ये हम किधर को चल रहे हैं" दरियाओं ने रुख़ मोड़ दिए दरख़्तों से हरे पत्ते झड़ रहे हैं कड़वी शराब के ख़ातिर यारों बेचारे मीठे फल सड़ रहे हैं ये हम किधर को चल रहे हैं नाव नहीं चलती अब बारिश में काग़ज़ के जहाज़ भी कहाँ उड़ते हैं बच्चों ने खिलौनों की ज़िद छोड़ दी अब वो सीधे कोडिंग सीखते हैं ये हम किधर को चल रहे हैं दौलत के नशे में इस हद तक चूर हैं अपनों के ख़ातिर अपनों से दूर हैं वक़्त-ओ-हालात के कारख़ाने में मालिक भी मजबूरी के मज़दूर है ये हम किधर को चल रहे हैं उपन्यास अब कोई नहीं ख़रीदता है दास्ताँ में लगते हैं वक़्त के महँगे ख़र्चे बाज़ार सारा मोबाइल खा डकार गया रोज़ कितनों के धंधे पड़ रहे हैं ठंडे ये हम किधर को चल रहे हैं शहरों में सब रखते हैं काम से काम काम कि मतलब से मतलब रखते हैं दौर दूरियों का और वक़्त फ़ासलों का गाँवों में भी कहाँ पहले से मेले पड़ते हैं ये हम किधर को चल रहे हैं फ़ेसबुक पर ठहरे यार दोस्त हज़ार ज़रूरत पड़ने पर गिनती के चार कोई ख़ून देने वाला नहीं मिलता है लाइक कमेंट करने वाले हैं बेशुमार ये हम किधर को चल रहे हैं उम्र-दराज़ दूसरी शादी कर रहे हैं कच्ची उम्र वाले ख़ुद-कुशी कर रहे हैं बात ये मज़ाक़ की नहीं, ग़ौर करने की है ज़िंदगी सिर्फ़ काट रहे हम या जी भी रहे हैं ये हम किधर को चल रहे हैं डाल बस्तों का बोझ बच्चों के कंधों पर लगा रखा है सब को किताबों की खोज में आज़ादी से पहले का हो या फिर बा'द का प्रेमचंद का वतन आज तलक सोज़ में ये हम किधर को चल रहे हैं नदी मैली लगती, झील में उतरने से डरते हैं तैरने के शौक़ीन स्विमिंग पूल को चलते हैं बेशक वक़्त की क़द्र पहले से काफ़ी बढ़ गई लेकिन घड़ी अब सिर्फ़ शौक़ से पहनते हैं ये हम किधर को चल रहे हैं बचपन छलाँग कर सीधे बड़े हो रहे हैं अधेड़ मर गए लोग सीधे बूढ़े हो रहे हैं परवाने माफ़िक़ शम्अ' को मचल रहे हैं दवा खा के भी कितने जल्दी जल रहे हैं ये हम किधर को चल रहे हैं — Jagveer Singh