नहीं होता यक़ीं तेरे पे ये जान
मुझे कर के दुखी तू है पशेमान
मिरे और ज़िंदगी के बीच का रब्त
वो मुझ से और मैं उस से हूँ परेशान
मैं काफ़िर हूँ प तू तो है नमाज़ी
न दे गाली महीना है ये रमज़ान
ये रस्मन रब्त दोनों को मुबारक
मैं तुझ से और तू अब मुझ से अंजान
कभी ख़ैर-ओ-ख़बर से आगे कर बात
निकल आए कोई शायद से इम्कान
नहीं मानेंगे दोनों के ही माँ-बाप
मैं ठहरा सिंह और जानाँ तू है ख़ान
— Jagveer Singh















