वफ़ा के बदले तू ने बे-वफ़ाई की

तिरे हक़ में तो भी मैं ने दुहाई दी

ज़मीं पे आ गिरा पंखा मिरे हाथों
तिरे शाइ'र ने इक ऐसी लड़ाई की

दबे थे फूल जितने भी किताबों में
सभी को रद्दी वाले ने रिहाई दी

रहे ग़ज़लें मिरी ग़मगीन यूँ ही सो
मिरे दुश्मन से तक उस ने सगाई की

नहीं माना था इतना भी ग़लत तुझ को
मगर फिर तू ने ही इतनी सफ़ाई दी

तलफ़्फ़ुज़ को बुरा कहती तो कोई ना
मगर उस ने ख़यालों की बुराई की

बड़े मन से मिरी ग़ज़लें तू सुनती है
तुझे मेरी कभी चीखें सुनाई दी

उसी की मर्ज़ी से होगा अँधेरा भी
उसी ने सामने से रौशनाई की

मुसीबत में सँभाला उस ने मुझ को यूँ
भरी सर्दी में मानो इक रज़ाई दी

हमारी शा'इरी में इस लिए दुख है
मुहब्बत ने हमारी जग-हँसाई की

— Jagveer Singh

More by Jagveer Singh

Other ghazal from the same pen

See all from Jagveer Singh →

Basant Shayari Collection

Shers of basant shayari collection.

All Basant Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling