क्या-क्या नौटंकी होती है नोट कमाने को

गाली तक खानी पड़ती है रोटी खाने को

तेरे ख़ातिर मैं अपनों से लड़ बैठा हूँ जान
और इक तू अब तक सोचे जा रही ज़माने को

इक दूजे को तकने से भी आगे बढ़े ये शाम
मेरी जाँ और ज़्यादा वक़्त नहीं शर्माने को

राँझा मजनूँ भोला अल्हड़ पागल और क्या-क्या
नाम दिए हैं दुनिया वालों ने दीवाने को

ऐसे-ऐसे लोगों के बीच साँस लेता हूँ
अंदर से आवाज़ें आती हैं मर जाने को

हम से बाप की इक बात तक न मानी जाती है
और इक वो वनवास गए थे वचन निभाने को

— Jagveer Singh

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