दिल भी धुआँ-धुआँ चश्म-ए-पुरनम भी

जी मुब्तला-ए-मसरूर और ग़म भी

शादी में भी रश्क-ए-क़मर है वो और
आज तो झुमके भी और ज़ुल्फ़-ए-ख़म भी

बस एक तिश्नगी की देरी सब को
फिर क्या गंगा क्या आब-ए-ज़मज़म भी

ख़ुशियाँ मुझ पर शफ़ीक़ होती है यूँ
रफ़्ता-रफ़्ता अक्सर अक्सर कम भी

ये क्या बात हुई ओ यार-ओ-अहबाब
दम से हम और दम से घटता दम भी

तेरी आँखों के कितने हैं क़ाइल
शे'र हमारे नींद हमारी हम भी

किया गुनाह-ओ-सवाब का ब्यौरा जब
शाद-ख़ुशी के साथ हुआ मातम भी

ग़ुबार-ए-याद-ए-माज़ी यूँ उठता है
पल में शो'ला पल भर में शबनम भी

इक औरत से मुझ को दुख ही दुख है
और फिर ये दुख भी वो ही मरहम भी

— Jagveer Singh

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