बस यहीं मेरी हयात-ओ-काइनात
रात-दिन खाए मुझे इक तेरी बात
रक़्स-ए-परवाना है पाने को मक़ाम
मुस्तक़िल जलती रहे लौ आज रात
तू गुल-ए-शान-ए-गुलिस्ताँ जान-ए-जाँ
तेरे आगे बाग़बाँ की क्या बिसात
मेरे हाथों में कभी तो यूँ थमा
चूड़ी वाले को थमाती जैसे हाथ
ये मुहब्बत है अगर लानत है फिर
दिल न देखा देखा मज़हब देखी ज़ात
मेरे सारे फ़ैसले तुझ से ख़ुदा
फ़त्ह भी तुझ से तेरी मर्ज़ी से मात
— Jagveer Singh















