लड़ाई रात से पर ग़ुस्सा हूँ दिन पर
नहीं कुछ तय मिरा सब टाला मुमकिन पर
पढ़े हैं शे'र तेरे गेसू पर मैं ने
मिरे शानों को हक़ है बिखरे वो इन पर
क़मर को हो मुयस्सर छुट्टी इक शब सो
अमावस की निगहबानी तराइन पर
नमाज़ी को तरस आता है काफ़िर पे
मगर काफ़िर को हैरत होती मोमिन पर
कमर के साथ बेटे ने भी छोड़ा साथ
ये क्या-क्या गुज़री इक बूढ़ी अभागिन पर
मुहब्बत पा चुकी थी हाशिया पहले
लगा बस हिज्र का इल्ज़ाम इक दिन पर
— Jagveer Singh















