सब को वो लड़की इक नाज़ुक कली नज़र क्यूँँ आती है
वो जो बिस्तर पे आ जाए तो जिस्म नोच खाती है
आख़िर सब के सब मेरी खाल नोचने को आए काम
मुझ को तो लगता था वो नाख़ुन शौक़ से बढ़ाती है
यूँ तो शराब पर भी वो करती है ना-ना लेकिन गर
पीने पर आ जाए तो फिर वो ख़ूँ तक पी जाती है
क्या रिश्ता है तेरी बाहों का सर्दी की शामों से
ऐ मेरी जाँ तेरी याद दिसम्बर में बढ़ जाती है
गर्मी में भी गर्दन रखनी पढ़ती मुझ को पोशीदा
तेरी छोड़ी हुई मुहब्बत मेरी शाल छुपाती है
— Jagveer Singh















