वो मेरे साथ ऐसे था कि सोने पे सुहागा है
ये आलम है जुदाई में कि सोना अब अभागा है
नहीं बनती पिता-बेटे की पर रहते हैं फिर भी साथ
घराना बाँध के रखती है औरत ऐसा धागा है
उसे कितना रिझा के बाँधा था मैं ने मगर फिर भी
वो क़ैदी जेल की दीवार-छत को फाँद भागा है
रदीफ़-ओ-क़ाफ़िया या बहर ये सब सिर्फ़ मोती हैं
ये सब तुझ पे टिके तुझ पे ग़ज़ल बाँधी तू धागा है
ये दुख है तेरी बाहों में सिमटकर तुझ को तकते नइँ
ये सुख है तेरी बाहों में कहाँ 'जगवीर' जागा है
— Jagveer Singh















