एक तो ज़्यादा ही रात ये लंबी है
और तेरी जुदाई भी तो चुभती है
माना चल तेरे बिन दिल गुज़र कर भी ले
जान पर जिस्म को तो कमी ख़लती है
मैं अकेला अकेला है बिस्तर मिरा
और फिर से दिसंबर की ये सर्दी है
बाँहों में तू थी तब कोई और बात थी
ख़ैर अब तो रज़ाई में तन्हाई है
ग़ुस्सा आया ही था मुझ को उस पे कि फिर
चूम के लब कहा उस ने और गर्मी है
शे'र में जो भी है उस की ही बात है
पढ़ रहा हूँ ग़ज़ल उस की ही मर्ज़ी है
— Jagveer Singh















