"ये हम किधर को चल रहे हैं"

दरियाओं ने रुख़ मोड़ दिए
दरख़्तों से हरे पत्ते झड़ रहे हैं
कड़वी शराब के ख़ातिर यारों
बेचारे मीठे फल सड़ रहे हैं
ये हम किधर को चल रहे हैं

नाव नहीं चलती अब बारिश में
काग़ज़ के जहाज़ भी कहाँ उड़ते हैं
बच्चों ने खिलौनों की ज़िद छोड़ दी
अब वो सीधे कोडिंग सीखते हैं
ये हम किधर को चल रहे हैं

दौलत के नशे में इस हद तक चूर हैं
अपनों के ख़ातिर अपनों से दूर हैं
वक़्त-ओ-हालात के कारख़ाने में
मालिक भी मजबूरी के मज़दूर है
ये हम किधर को चल रहे हैं

उपन्यास अब कोई नहीं ख़रीदता है
दास्ताँ में लगते हैं वक़्त के महँगे ख़र्चे
बाज़ार सारा मोबाइल खा डकार गया
रोज़ कितनों के धंधे पड़ रहे हैं ठंडे
ये हम किधर को चल रहे हैं

शहरों में सब रखते हैं काम से काम
काम कि मतलब से मतलब रखते हैं
दौर दूरियों का और वक़्त फ़ासलों का
गाँवों में भी कहाँ पहले से मेले पड़ते हैं
ये हम किधर को चल रहे हैं

फ़ेसबुक पर ठहरे यार दोस्त हज़ार
ज़रूरत पड़ने पर गिनती के चार
कोई ख़ून देने वाला नहीं मिलता है
लाइक कमेंट करने वाले हैं बेशुमार
ये हम किधर को चल रहे हैं

उम्र-दराज़ दूसरी शादी कर रहे हैं
कच्ची उम्र वाले ख़ुद-कुशी कर रहे हैं
बात ये मज़ाक़ की नहीं, ग़ौर करने की है
ज़िंदगी सिर्फ़ काट रहे हम या जी भी रहे हैं
ये हम किधर को चल रहे हैं

डाल बस्तों का बोझ बच्चों के कंधों पर
लगा रखा है सब को किताबों की खोज में
आज़ादी से पहले का हो या फिर बा'द का
प्रेमचंद का वतन आज तलक सोज़ में
ये हम किधर को चल रहे हैं

नदी मैली लगती, झील में उतरने से डरते हैं
तैरने के शौक़ीन स्विमिंग पूल को चलते हैं
बेशक वक़्त की क़द्र पहले से काफ़ी बढ़ गई
लेकिन घड़ी अब सिर्फ़ शौक़ से पहनते हैं
ये हम किधर को चल रहे हैं

बचपन छलाँग कर सीधे बड़े हो रहे हैं
अधेड़ मर गए लोग सीधे बूढ़े हो रहे हैं
परवाने माफ़िक़ शम्अ' को मचल रहे हैं
दवा खा के भी कितने जल्दी जल रहे हैं
ये हम किधर को चल रहे हैं

— Jagveer Singh

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