लगा था एक अर्सा तेरा होने में
कि इक लम्हा लगा है तुझ को खोने में
कोई अंदर से आवाज़ें लगाता हैं
सुहूलत चाहिए अब मुझ को रोने में
यही मुश्किल है मेरे जैसे मर्दों की
बड़ा मुश्किल है इक औरत का होने में
पड़ा तब जा कही मुझ को क़रार-ओ-अम्न
रखी हिर्स-ओ-हवस जब एक कोने में
जवानी पर लगे हैं दाग़ इतने दोस्त
कि पूरी ज़िंदगी लगनी है धोने में
शबिस्ता भी किसी कोठे से कम थोड़ी
है अन्तर साथ होने साथ सोने में
बचेगा हाथ मेरा थाम कर के वो
लगा है जो मुझे कब का डुबोने में
— Jagveer Singh















