मेरे दुश्मन को वफ़ादार समझते हैं लोग
पर मुझे आज भी ग़द्दार समझते हैं लोग
ग़मज़दा होते हुए भी मैं तो हँस देता हूँ
इस लिए मुझ को अदाकार समझते हैं लोग
इक परिंदे को रिहा ही तो किया था मैं ने
आज तक मुझ को गुनहगार समझते हैं लोग
— Meem Alif Shaz
पर मुझे आज भी ग़द्दार समझते हैं लोग
ग़मज़दा होते हुए भी मैं तो हँस देता हूँ
इस लिए मुझ को अदाकार समझते हैं लोग
इक परिंदे को रिहा ही तो किया था मैं ने
आज तक मुझ को गुनहगार समझते हैं लोग
Other ghazal from the same pen
Shers of revenge shayari collection.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling