ग़म में हुआ इज़ाफ़ा घटाने से और भी
आती है तेरी याद भुलाने से और भी
पहली दफ़ा में ठीक से होता नहीं है कुछ
तू ने लगाए होंगे ठिकाने से और भी
सब ज़ेर हो गए थे तिरे ग़म के सामने
शिकवे थे मुझ को वरना ज़माने से और भी
दीवाना था तिरा मैं वगरना तो लड़कियाँ
करती थीं बात तेरे दिवाने से और भी
लोगों नहीं बताओ मुझे रिश्ता लग गया
बढ़ता है दर्द-ए-दिल ये बताने से और भी
— Junaid Shaad















