sab seemit hai | सब सीमित है

  - Saurabh Yadav Kaalikhh

सब सीमित है

यहाँ कोई रिक्त नहीं है
सिवाए लाल कोई रक्त नहीं है
किसी के पास है थोड़ा ज़्यादा
तो कोई बिस्तर पर पड़े सोचता कि
वक़्त कम है या वक़्त ही नहीं है

सब सीमित है
सीमित ज़मीं है सीमित है ये खुला आसमान
सीमित इस आसमान तले रह रहे हम इंसान
सीमित है आपका मकान भी
सीमित आपकी मौत का सामान भी

सीमित है धड़कन की रफ़्तार भी
ये दहर भी ये दयार भी
सीमित हैं यहाँ यार भी
यारों की बातें मुलाक़ातें
दिन का वक़्त हो या ये रातें

सीमित हैं ग़म यहाँ
ग़म के बाद की ख़ुशी
सीमित सी है रस्सी
और उस
में पड़ने वाली गाँठ
लोगों के अपने नवाबी ठाठ

सीमित रिश्ते हैं
नहीं दिखते फ़रिश्ते हैं
सीमित आपके घर गाड़ी
मोबाइल की किश्तें हैं
जिन्हें भरने के लिए
आप अपने सीमित जीवन में
सीमित कमाई के लिए
सीमित संख्या में काम करते हैं

सीमित है आपका वक़्त भी
सीमित हैं ज़िंदगी के पड़ाव
हर पड़ाव के दरख़्त भी

सीमित है आपकी जवानी जिस्म में रवानी
ये सारी हवा ये पानी हमारी तुम्हारी वाणी

सूरज का उगना डूबना सीमित है
डूबता सूरज देख समझ आया
उजाला सीमित है
और उगता सूरज देख समझ आया
कि अँधेरे से सीमित रिश्ता ही
स्थिरता की राह है
स्थिरता सीमित है
सीमित है राह भी
ख़ुद की परवाह भी

सीमित उम्र है
निश्चित मृत्यु है
सीमित है आपकी काठी
सीमित है लकड़ी लाठी
सीमित है आपके ताबूत का वज़न
सीमित है आपके ऊपर पहनाया गया कफ़न
आपके लिए तय हुई दो गज़ भर ज़मीन
आपके नीचे बिछी आख़िरी कालीन
सीमित है

सीमित शब्दों से जितना लिख पाए लिखते गए
मुँह उठाकर कहीं से कालिख़ आए पढ़ते गए
जितना पढ़ पाए
क्योंकि वक़्त बेहद सीमित था
सीमित है सीमित रहेगा

  - Saurabh Yadav Kaalikhh

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