यादों का कारवाँ

सफ़र दर सफ़र यादें बनती जा रही हैं
यादों की अलमारी सजती जा रही है
हम को हम थोड़ा और मिलते जा रहे हैं
वक़्त गुज़र रहा है
हवा गुज़र रही है
समुंदर के सहारे पानी गुज़र रहा है
आसमाँ के सहारे चाँद तारे सूरज भी
और साथ साथ ये मौसम भी
ख़्वाहिशें गुज़र रही हैं
गुज़र रहे हैं ख़्वाब भी
हौले हौले
एक रोज़
तुम गुज़र जाओगे
हम गुज़र जाऍंगे

फिर मिलेंगे किसी दुनिया में
क्या पता इन्हीं दोस्तों और यादों के साथ
जो कमा रहे हैं हम तुम
इस दुनिया में

— Saurabh Yadav Kaalikhh

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