kab kahaan ham kisi raushni ke li.e | कब कहाँ हम किसी रौशनी के लिए

  - Kaif Uddin Khan

कब कहाँ हम किसी रौशनी के लिए
लड़ रहे हैं फक़त तीरगी के लिए

मर्तबा फिर भी कमतर नहीं हो सका
हमने क्या कुछ किया आजिज़ी के लिए

देखना उसका मेरी तरफ़ ग़ौर से
मसअला बन गया ज़िन्दगी के लिए

ऐसे हासिल नहीं मुल्हिदी सो तुम्हे
इक सनम चाहिए काफ़िरी के लिए

तेरा होना इज़ाफ़ी है वरना मेरे
पास सब कुछ ही था बे-रूख़ी के लिए

मौत वैसे सहूलत से हासिल थी पर
हमको जीना पड़ा ख़ुदकुशी के लिए

पा-ब-जौलाँ किया रफ़्तगी ने मगर
हम भी चलते रहे मैकशी के लिए

  - Kaif Uddin Khan

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