haseen KHvaab ke naqsh-o-nigaar kyun toote | हसीन ख़्वाब के नक़्श-ओ-निगार क्यूँँ टूटे

  - Kaif Uddin Khan

हसीन ख़्वाब के नक़्श-ओ-निगार क्यूँँ टूटे
ख़िलाफ़-ए-बाइस-ए-ताबीर थे सो यूँँ टूटे

मैं इसलिए भी तेरे सेहर में अभी तक हूँ
मैं चाहता ही नहीं हूँ तेरा फ़ुसूँ टूटे

मैं हार जाऊँ मगर जीत छीन लूँ तुझ सेे
के इस मक़ाम पे आकर मेरा जुनूँ टूटे

जहान भर में दिखाई दे वाहिमा मेरा
गिरे जो ख़्वाब कभी आँख से तो यूँँ टूटे

शदीद शोर-ए-फ़ुँग़ाँ चार-सू सुनाई दे
सुकूत का जो मेरे दरमियाँ सुतूँ टूटे

किसी तरह ये बदन महव-ए-इस्तिराहत हो
किसी तरह तो मेरी शोरिश-ए-दरूँ टूटे

कभी रखा ही नहीं दिल को हाथ पर मैंने
कभी गिरा ही नहीं दिल तो फिर ये क्यूँँ टूटे

इसे शिकस्त नहीं ज़र्फ़ तू समझ उसका
वो तेरे सामने हो कर जो सर-निगूँ टूटे

  - Kaif Uddin Khan

haseen Shayari

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