kuchh bhi nahin tiryak bas teri jafaa ka chahiye | कुछ भी नहीं तिर्याक बस तेरी जफ़ा का चाहिए

  - Kaif Uddin Khan

कुछ भी नहीं तिर्याक बस तेरी जफ़ा का चाहिए
माल-ए-ग़नीमत में मुझे थोड़ा सा हिस्सा चाहिए

आसानियों से बे-वजह तारीक होता जाऊँगा
मुझ को चमकने के लिए थोड़ा अँधेरा चाहिए

इस रूह की तस्कीन को बाहर नहीं वो शख़्स पर
अब दरमियाँ अपने मुझे सारे का सारा चाहिए

अब हिज्र की तकलीफ़ को नासूर करना है मुझे
अब ज़ख़्म यानी क़ल्ब पर भी और गहरा चाहिए

हासिल है वो हर एक को, पाना उसे आसान है
उस तक पहुँच ने के लिए पामाल रस्ता चाहिए

हर बार चुप रहने का मतलब सिर्फ़ चुप रहना नहीं
जो बे-तरह खामोश हैं उनको तमाशा चाहिए

  - Kaif Uddin Khan

Ghayal Shayari

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