किसी भी तौर ये हद्द-ए-नज़र के बस में नहीं
तुम्हारा हुस्न मेरे क़ैद-ए-दस्तरस में नहीं
मैं चाहता हूँ मोहब्बत को तर्क कर दूँ अब
मेरे क़रीब कोई मसअला हवस में नहीं
ये ज़िंदगी की मसर्रत भी एक धोका है
सुकून मौत से आएगा जो नफ़स में नहीं
यूँँ अक़्ल-ओ-फ़ह्म से फ़िक्र-ए-सवाल क्या करना
जवाब है कोई ऐसा जो पेश-ओ-पस में नहीं
अजीब लुत्फ़-ए-मसर्रत है ये असीरी भी
वो इज़्तिराब में रहते हैं जो क़फ़स में नहीं
तुम्हें ये शौक़-ए-ख़यालात मार डालेगा
अगर जुनून-ए-दरूँ आगही के बस में नहीं
मेरे यक़ीन को हासिल नहीं के ये दुनिया
सराब-ओ-ख़्वाब है जो मेरे दस्तरस में नहीं
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