इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख़्वाब झलकता है

इन बातों में देखो जैसे कोई राज़ खटकता है

लहजे में एक जुस्तजू सीने में बेचैनी सी है
मेरा ग़म तो मेरा है तू क्यूँ महताब सिसकता है

इन कूचों में काम तिरा क्या इन गलियों से क्या रिश्ता
पागल पागल आवारा सा क्यूँ बे-नाम भटकता है

— Kalamkash

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