मिरा ये दर्द उसकी मेहरबानी है
सुनाता हूँ ज़रा ठहरो कहानी है
गया वो छोड़ फिर इक मर्तबा हमको
जो कहता तू तो मेरी ज़िंदगानी है
रखा है प्यार हिस्सों में परिंदों के
शजर की नौकरी बस चोट खानी है
किसी के जाने से बदला नहीं लहजा
उड़ाई ख़ाक में अपनी जवानी है
की है इक 'उम्र मैंने ख़र्च तुम पे, पर
तुम्हारे वास्ते तो ये कहानी है
बहुत खुश रहती मेरे साथ तुम,लेकिन
मिरी तुमने कभी भी बात मानी है
किसी महफ़िल में मैं कुछ कह नहीं पाता
कहानी और मुकम्मल भी सुनानी है
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