मिरा ये दर्द उस की मेहरबानी है
सुनाता हूँ ज़रा ठहरो कहानी है
गया वो छोड़ फिर इक मर्तबा हम को
जो कहता तू तो मेरी ज़िंदगानी है
रखा है प्यार हिस्सों में परिंदों के
शजर की नौकरी बस चोट खानी है
किसी के जाने से बदला नहीं लहजा
उड़ाई ख़ाक में अपनी जवानी है
की है इक उम्र मैं ने ख़र्च तुम पे, पर
तुम्हारे वास्ते तो ये कहानी है
बहुत ख़ुश रहती मेरे साथ तुम,लेकिन
मिरी तुम ने कभी भी बात मानी है
किसी महफ़िल में मैं कुछ कह नहीं पाता
कहानी और मुकम्मल भी सुनानी है
— Kartik tripathi















