बीस की है वो बच्ची नइँ
फिर भी इशारा समझी नइँ
उस से जुदा हुए हैं तो
बज़्म में गिनती होती नइँ
शहर बुला रहा था पर
गाँव की रेत छोड़ी नइँ
कहता रहा उतरने को
हम ने भी कश्ती छोड़ी नइँ
गाँठ रहेगी रिश्ते में
सोच के डोर जोड़ी नइँ
रोती रही वो रस्ते भर
बाप ने कार रोकी नइँ
सारे जला दिए थे ख़त
याद की राख ढोई नइँ
— Rohan Hamirpuriya















