मौक़ा मिलते ही वार करती है
ज़ीस्त कब इंतिज़ार करती है
ख़्वाब आँखों में जब भी पलते हैं
ज़िंदगी तार-तार करती है
ज़िंदगी लगती है किनारे पे
लाश जब दरिया पार करती है
जुस्तजू में भटकते रहते हैं
आरज़ू बे-क़रार करती है
जिस से मिलती है मुस्कुरा के वो
उस को अपना शिकार करती है
मैं ही क्या हर कोई समझ बैठा
सिर्फ़ वो मुझ से प्यार करती है
— Rohan Hamirpuriya















