मौक़ा मिलते ही वार करती है
ज़ीस्त कब इंतिज़ार करती है
ख़्वाब आँखों में जब भी पलते हैं
ज़िंदगी तार-तार करती है
ज़िंदगी लगती है किनारे पे
लाश जब दरिया पार करती है
जुस्तजू में भटकते रहते हैं
आरज़ू बेक़रार करती है
जिस से मिलती है मुस्कुरा के वो
उस को अपना शिकार करती है
मैं ही क्या हर कोई समझ बैठा
सिर्फ़ वो मुझ से प्यार करती है
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