मिली होती ख़ुशी सबको तो सारे ग़म कहाँ जाते
न होते ज़ख़्म तो फिर ये सभी मरहम कहाँ जाते
बचा था रास्ता पलकों से आगे चल के मरने का
कहें सपने सभी उन सेे बिछड़ कर हम कहाँ जाते
मिली होती अगर आँखें तुम्हारी ही तरह सबको
हराती इक नज़र सबको सभी फिर बम कहाँ जाते
गिरी है धूप फिर धरती ने सींचा आ गई फिर रुत
उगाता आदमी सब कुछ तो फिर मौसम कहाँ जाते
उगाता फल वही जो मौसमों की मार सहता है
सरल होती अगर मंज़िल तो पेच-ओ-ख़म कहाँ जाते
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