Kunu
Kunu
Ghazal

और कुछ राद सुना वहशत में

बन गया दर्द क़ज़ा वहशत में

सब जुनूँ बूद सक़ाफ़त तक ही
कुछ नहीं नाज़ वफ़ा वहशत में

ना-रसा आब लबों का तेरे
बे-मज़ा रात किता वहशत में

आरज़ू बाब मिरे पैरामन
बारहा यार फ़ना वहशत में

पेशतर राह बना क़ातिल तक
और फिर वार हुआ वहशत में

— Kunu

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