अब तो महफ़ूज न अपना मुझे घर लगता है
पढ़ के अख़बार की ख़बरें मुझे डर लगता है
सौ दफ़ा सोचना फिर जा के भरोसा करना
कोई सच में भी वफ़ादार अगर लगता है
मैं ने काटी है वो दहशत से भरी घड़ियाँ दोस्त
और लोगों को जिसे सोच के डर लगता है
रोक लेती है मुझे घर में क़सम देकर माँ
हादिसे का कोई आसार अगर लगता है
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















