हाए क्या थे जवानी से पहले के दिन
वो खुले आसमाँ में नहाने के दिन
ज़ेहन में दौड़ते हैं यहाँ से वहाँ
याद बनकर गुज़िश्ता ज़माने के दिन
मौज-मस्ती से लबरेज़ थी ज़िंदगी
आए जब तक नहीं थे कमाने के दिन
यार कमबख़्त ये नौकरी क्या लगी
खा गई दोस्तों से ये मिलने के दिन
एक तस्वीर देखी तो रोने लगे
जो कि खींची गई थी बिछड़ने के दिन
अब वो पहले के जैसी तबीअत कहाँ
आ गए हैं ख़ुदा घर में रहने के दिन
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















