ज़िंदगी तुझ सेे कोई शिकायत नहीं
जो है काफ़ी है ज़्यादा की हसरत नहीं
देख लेते हैं आँगन से उड़ते जहाज़
गाँव में कोई ऊँची इमारत नहीं
मैं यक़ीनन ये दावे से कहता हूँ दोस्त
बेटियों के बिना घर में बरकत नहीं
तुम बुज़ुर्गों की बातें सुनोगे अगर
तो तुम्हारे भटकने की नौबत नहीं
सोच कर लूटना तू लुटेरे मुझे
पास मेरे मोहब्बत है दौलत नहीं
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















