सर से कब बुलंदी का ये फ़ुतूर निकलेगा

जो अगर न निकला तो दम ज़रूर निकलेगा

कोयला समझते हैं जो हमें समझने दो
एक दिन यहीं से ही कोहिनूर निकलेगा

जिस मिज़ाज का हूँ मैं उस हिसाब से मुर्शिद
बात-बात में मुँह से सच ज़रूर निकलेगा

चाँद और सितारे भी पड़ गए हैं हैरत में
था नहीं यक़ीं इनको मुझ से नूर निकलेगा

— MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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