उसके दिल का बोझ हल्का कर रहे हैं

बाँट कर ग़म उसका आधा कर रहे हैं

मर गए हम ही शराफ़त में वगरना
लोग तो दुनिया में क्या-क्या कर रहे हैं

इन दिनों हम भी किसी दिल की ज़मीं पर
रोज़ थोड़ा-थोड़ा क़ब्ज़ा कर रहे हैं

उम्र दिखने लग गई चेहरे पे फिर भी
हम जवाँ होने का दावा कर रहे हैं

हादसों का शहर है ये तब ही साहब
हर घड़ी महसूस ख़तरा कर रहे हैं

शर्म है या डर है क्या है बोलिए आप
इश्क़ करने से जो तौबा कर रहे हैं

— MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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