साठ सत्तर की ज़िंदगानी है
कैसे फिर इश्क़ जावेदानी है
एक तो ख़ासियत बहकने की
उस पे बे-ढब सी ये जवानी है
ये जो बे-रंग लग रहा हूँ मैं
एक तितली की मेहरबानी है
उस ने दौलत का इंतिख़ाब किया
लगती पगली है पर सियानी है
अब के हरगिज़ तुझे भुलाऊँगा
अब के ये बात मैं ने ठानी है
— Marghoob Inaam Majidi















