ज़ेहन में है कितना दर्द तुम को कुछ दिखाऊॅं क्या
जौन हूँ न मीर तुम को यार कुछ सुनाऊॅं क्या
आज-कल बहुत अकेले रहते हो सुना है ये
गर हो हुक्म तो कहो के ख़्वाब में मैं आऊॅं क्या
राह भटके हैं पथिक गुज़र के कूचे से तिरे
जो हैं ये रिवायतें मैं भी अब आजमाऊॅं क्या
— Manish Yadav















